देश की राजनीति में महिलाएं बहुत पीछे!

0
124


भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

आज जब हम हर स्तर पर स़्त्री-पुरुष की समानता की बात करते हैं, तो पाते हैं, अभी भी देश में पुरुष महिलाओं को अपने समकक्ष रखने में गौरवान्वित नहीं होते, वरन कोशिश करते हैं कि वह पीछे ही रहे. ऐसी स्थिति देश के संपूर्ण विकास के लिए अवरोध है. यहां तक कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार ब्रिटिश काल में ,‘गर्वनमेंट आफ इंडिया एक्ट 1919’ से मिला, उससे पूर्व किसी कानून को बनाने में, महिलाएं सहभागी नहीं थीं. 1921 में मद्रास विधान परिषद ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसके अनुसार कुछ महिलाओं को ही वोट देने का अधिकार दिया, फिर उसके कुछ वर्षों बाद एक और प्रस्ताव पास किया गया, उसके द्वारा महिलाओं को कानून बनाने में शरीक किया गया. फिर 1926 में सरकार ने 40 वर्षीय महिला डा. मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी को विधान परिषद में मनोनीत किया. चुने जाने के बाद डा. रेड्डी ने परिषद के अध्यक्ष को धन्यवाद देते हुए संबोधित किया कि श्रीमन, मैं ही एक महिला सदस्य इस परिषद में हूं, आप जानते ही हैं कि आज भी हम पिछड़े हैं, क्योंकि शिक्षा के अभाव में सौ में से 2 ही सिर्फ लिख-पढ़ सकती हैं, यह हम सब महसूस करते हैं कि कोई भी राष्ट्र बगैर महिलाओं के एक्टिव सपोर्ट और सहयोग के संपन्न नही हो सकता है.


पहली कानून निर्मात्री

इस प्रकार डॉ. रेड्डी देश की पहली कानून निर्मात्री महिला के रूप मे जानी जाती हैं. एक वाकया जनवरी 1930 का मद्रास विधान परिषद का है. उस सभा में वेश्यावृति पर परिभाषा गढ़ी जा रही थी. अधिकांश सदस्यों ने परिभाषित किया कि ‘एक औरत जो अपनी देह पेश करती है, लैंगिंक संबंध बनाने के लिए और उसके ऐवज में धन लेती है, वह वेश्या है.’ तब डॉ. रेड्डी ने इसमें औरत शब्द की जगह व्यक्ति या पर्सन को संशोधित किया. इसे 100 सदस्यों की परिषद ने स्वीकार किया. इन सब बातों का जिक्र करने का उद्येश्य यह है कि हमने महिलाओं को इस बीच के काल में अपना सहभागी नहीं बनाया.


स्वतंत्रता आंदोलन में महिला भागीदारी

बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने भाग लिया,लेकिन पुरुषों के अनुपात में वह नगण्य ही थीं. संविधान सभा में 15 महिलाएं सदस्य थीं. स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करने वाली वीरांगना लक्ष्मी बाई के बलिदान को कौन भूल सकता है. सुभाष चंद्र बोस के आईएनए की सक्रिय सदस्य लक्ष्मी सहगल को कौन नहीं जानता.


साहसी महिला श्रीमती इंदिरा गांधी

आजादी के बाद तो देश में प्रधानमंत्रियों में काफी लंबा कार्यकाल श्रीमती इंदिरा गांधी का रहा. वह साहस की धनी महिला थी. कम ही लोग होते हैं, जो विकट परिस्थितियों में धैर्य के साथ नेतृत्व की क्षमता रखते हैं, ऐसे लोगों में इतिहास श्रीमती इंदिरा गांधी को याद करता रहेगा. यह होते हुए भी महिलाओं की भागीदारी आजाद भारत में भी बहुत कम रही विधान सभाओं और संसद में उनका अनुपात पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम है. पिछली लोकसभा में 12 प्रतिशत ही महिलाएं संसद में थीं, वही स्थिति आज भी है. पंचायतों में महिलाओं का प्रतिशत राजीव गांधी के काल में संविधान में संशोधन कर 33 प्रतिशत किया गया था. जबकि यह प्रतिशत भी कम है, क्योंकि देश की आधा आबादी तो महिलाओं की है.


बिल लटका हुआ है!

2008 में राज्यसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत देने का बिल तो पास हुआ, परंतु लोक सभा भंग होने के कारण, वह निचले सदन में पास नहीं हो सका. यह अभी तक लटका हुआ है, नियम के अनुसार अब नए सिरे से ही सदन में पेश हो सकता है. वर्तमान सरकार के पास बहुमत है, उसका उपयोग महिलाओं को संसद में 50 प्रतिशत का हिस्सा देने का काम प्रधानमंत्री मोदी को करवाना चाहिए, क्योंकि वे बहुत बड़े बहुमत के साथ सदन में आए हैं.

उम्मीद करते हैं- आधी आबादी को सम्मानित कर संसद में पहुंचाने में अपनी भूमिका तय करेंगे. वेसे आने वाले कुछ ही महीनों में राज्यों में चुनाव हैं, यहां कुछ तो नहीं ,पर पिछली विधान सभाओं से ज्यादा महिला प्रतिनिधियों को हर पार्टी टिकट देंने का प्रयास करे, तो यह समाज में समानता का उदाहरण दल पेश करेंगे.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here