क्या जजों की नियुक्तियां बनाने की विधि में सदी बीत जाएगी?

0
142

भगवती प्रसाद डोभाल (संपाकदीय)

देश के राष्ट्रपति ने संविधान दिवस पर अपने मन की बात कही. आशय था कि जजों की नियुक्तियों के सलेक्शन में सुधार होना चाहिए. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने छह वर्ष पूर्व नेशनल जुडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन यानी एनजेएसी के संसद से पास किए बिल को स्वीकृति दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने 4-1 से अस्वीकृत कर दिया था. उसकी जगह पर, जो पुरानी व्यवस्था चल रही थी कि जज ही जजों की नियुक्ति करेंगे, उसी पर न्यायाधीशों ने फैसला सुनाया था. भारत सरकार ने, जो कानून बनाया था, उसे पीछे धकेल दिया. अब इसी तनातनी में बहुत समय तक अदालतों में जजों की नियुक्तियों का सिलसिला ढ़ीला रहा. इसमें कुछ सुधार सुप्रीम कोर्ट में आया, वहां पर निश्चित किए गए जजों में से अभी एक की नियुक्ति होनी बाकी है. लेकिन नीचे की अदालतों- हाईकोर्ट से लेकर और नीचे तक की अदालतों में जजों की नियुक्ति के बिना केसों का अंबार लगा हुआ है.

यदि केस ऐसे ही आते रहे और उनका निपटारा समय पर नहीं हुआ तो न्ययालय का होना और न होना बराबर का ही रहेगा. बगैर न्याय मिले ही सब कुछ समाप्त हो जाएगा. लोगों की जो सुप्रीम उम्मीद न्यायालयों के प्रति रही है, उसका क्षरण बड़ी तेजी से हो रहा है. इसी के संदर्भ में राष्ट्रपति महोदय ने अपनी सदइच्छा जताई. उनका मानना है कि नियुक्तियों के सुधार में न्यायालयों की स्वतंत्रता को कम किए बगैर तेजी से नियुक्तियों की विधि बननी चाहिए.

स्वतंत्र न्यायालयों का विचार मेरा दृढ़ निश्चय है

मेरा इस बात पर दृढ़ मत है कि न्यायालयों की स्वतंत्रता में जजों की नियुक्तियों को लेकर कोई समझौता नहीं होना चाहिए. उच्च न्यायालय के जजों द्वारा ही निम्न अदालतों के जजों की नियुक्तियों पर असहमति जताते हुए वे आगे कहते हैं कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के द्वारा नीचे से टैंलेंट को प्रमोट किया जाने की प्रणाली को लागू किया जाना चाहिये. इसे सबसे नीचे से सबसे ऊपर तक के जजों की नियुक्ति में अपनाना होगा. यह विचार नया नहीं है, यह आधा शताब्दि से पहले से चल रहा है, बगैर किसी परीक्षण के.

पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया

15 अक्टूबर 2016 को पांच जजों की बेंच ने 4:1 से फैसला दिया, जिसमें एनजेएसी को अमान्य करार देकर पुराने कॉलेजियम प्रणाली पर अपनी मुहर लगाई. और पुरानी जजों की नियुक्ति की प्रणाली को ही उचित बताया.

मुख्य न्यायाधीश

भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रामना ने शनिवार को विचार व्यक्त किए कि सांसद या विधायक पूरी तरह से उस कानून को नहीं समझते जिसे वह बना रहे होते हैं, और कानून बना देते हैं, फिर वही कभी बड़ा मुद्दा बन जाता है. इस तरह से बने कानून न्यायालयों में आकर न्याय पालिका में केसों को बढ़ा देते हैं, जिससे फैसले देने में समय लग जाता है. वह आगे कहते हैं हमें ध्यान रखना चाहिए कि चाहे आलोचनाएं या बाधाएं क्यों न आएं, लेकिन हमें अपने न्याय देने में कोई कमी नहीं करनी चाहिए. हमारा मुख्य ध्येय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है.

न्यायालयों के इंफ्रास्टक्चर में कमियां

यह बात भी सही है कि केसों के अंबार लगाने में न्यायालयों में आधुनिक उपकरणों की सुविधाएं नहीं हैं, हालांकि अपने भाषण में केंद्रीय कानून मंत्री रिज्जू सफाई देते हुए कहते हैं कि केंद्र सरकार पर्याप्त धन निम्न से लेकर उच्च अदालतों को दे रही हैं, पर राज्य उसका उपयोग सही ढ़ंग से नहीं कर रहे हैं, जिससे यह समस्याएं पैदा हो रही हैं.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि न्याय प्रक्रिया धीमी होगी, तो बहुत सारे आवश्यक कार्य न्यायालयों के बस्ते में पड़े रहेंगे, दशकों बीत जाएंगे, फैसले नहीं होंगे, तो क्या फायदा ऐसे लोकतंत्र का, तब तो ऑटोक्रेसी ही सही है, जहां तुरंत फैसले हो जाते हैं, चाहे गलत ही क्यों ना हों, निपट तो जाते हैं. हमारे संविधान ने सारी व्यवस्थाएं नागरिकों की सुरक्षा के लिए की हुई हैं, गड़बड़ी उस जगह पर है, जो संविधान के नियमों पर न चल कर अपने ढ़ंग से चलते हैं, इससे भुगतना अदालतों को पड़ता है, संविधान की व्याख्या करते-करते.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here