कोवैक्सीन को मान्यता से रोक क्योंं?

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

महामारी कोरोना से कुछ राहत मिलने की खबरें आ रही हैं. देश में दूसरे सप्ताह तक 100 करोड़ डोजें लग जाएंगी. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार अक्टूबर में 28 करोड़ डोजों का उत्पादन देश करेगा. यह मनसुख मनडाव्या एक पत्रकार वार्ता में कहते हैं कि 73 फीसदी युवाओं को एक डोज वैक्सीन की लगी है. इसके अलावा 29 फीसदी लोगों को दोनों डोजें लग चुकी हैं. लगभग इसमें 22 करोड़ कोविशील्ड और 6 करोड़ कोवैक्सीन हैं.

जो वैक्सीन नहीं लगाएगा,उसकी छुट्टी!

दूसरी ओर दिल्ली के मुख्यमंत्री ने आदेश जारी किया है, जिसके अनुसार दिल्ली के सरकारी कर्मचारियों को कोरोना की वैक्सीन लगानी जरूरी है, कम से कम एक डोज तो लगनी ही चाहिए. यदि कोई कर्मचारी इस आदेश का उल्लंघन करेगा तो, उसे आफिस नहीं आने दिया जाएगा. यदि वह आएगा भी तो उसे अनुपस्थित माना जाएगा. दिल्ली के कर्मचारियों के लिए यह आवश्यक होगा.

दूसरी तरफ एक और रिपोर्ट पर कुछ वैज्ञानिक विचार कर रहे हैं, उनमें से एक वैज्ञानिक डॉ. संजय राय बता रहे हैं कि वैक्सीन लेना आवश्यक नहीं है. यदि किसी को प्राकृतिक रूप से इंफेक्शन हो गया और वे स्वस्थ हैं, तो उन्हें वैक्सीन की डोज की जरूरत नहीं है. हां, जिन्हें इंफेक्शन नहीं हुआ है, तो वे वैक्सीन ले सकते हैं. बूस्टर डोज को भी वे एक कामर्शियल नजर से देखते हैं. वे जोर देते हैं कि आरटीपीसीआर टेस्ट करवाना जरूरी है, इससे वायरस की शरीर में उपस्थिति का पता चल सकता है. यदि इस टेस्ट से वायरस की उपस्थिति शरीर में मिलती है, तब उस व्यक्ति को उपचार देने की आवश्यकता है. दुनिया के बहुत सारे देशों के आंकड़ों का वे जिक्र करते हैं. यह भी वे मानते हैं कि जिन लोगों को दो डोजेज भी लग चुके हैं, वे भी इंफेक्शन के शिकार हुए हैं. इजरायल भी उन देशों में से एक है.

आरटीपीसीआर टेस्ट है क्या?

आरटीपीसीआर टेस्ट यानी रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पालीमर्स चेन रिएक्शन टेस्ट, इसके जरिए व्यक्ति के शरीर में कोरोना वायरस का पता लगाया जाता है. इससे वायरस के आरएनए की जांच की जाती है. जांच के दौरान शरीर के कई हिस्सों से नमूने लिए जाते हैं. यह टेस्ट कोरोना वायरस की पहचान करता है. यदि किसी को शुरू में टेस्ट से पता लग जाए कि इसे कोरोना हो गया है, तो उसका उपचार किया जा सकता है. वैक्साीन उस दौरान उतनी असरदार नहीं होती, क्योंकि हमारा शरीर उस दौरान खुद ही वायरस के खिलाफ एंटीबाडीज बनाने में व्यस्त है. हां, कोरोना हुए व्यक्ति को यदि वैक्साीन दी जाती है, तो उसको फायदा नहीं है, उसकी वजह है कि शरीर ने खुद ही उसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता अपने में तैयार कर दी है. इसलिए डाक्टर संजय राय का मानना है कि उस व्यक्ति में साइड इफैक्ट के खतरे भी हो सकते हैं, जिसे कोरोना होने के बाद वैक्सीन दी जाती है.


बच्चों के लिए कोवैक्सीन

भारत बायोटैक ने बच्चों के लिए कोवैक्सीन तैयार कर दी है, पर यह भी आश्चर्य की बात है कि अभी तक युवाओं के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने, जो कोवैक्सीन अब तक लोगों को लग चुकी है-उसे मान्यता नहीं दी है. ऐसा प्रश्न उठना स्वाभाविक है. इसमें ऐसी देरी का क्या कारण है. बहुत सारे लोगों को इससे विदेश जाने में दिक्कत आ रही है. जबकि 11.49 फीसदी लोगों को कोवैक्सीन लग चुका है.

ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कोवैक्सीन को किन कारणों से विश्व स्वास्थ्य संगठन मान्यता देने में हिचकिचा रहा है. क्या यह विकसित देशों का खेल तो नहीं, भारत के प्रोडक्ट को विश्व बाजार में रोकने का?

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