कोरोना की ‘संजीवनी’ वैक्सीन की दो डोज के बीच अंतर कम करने की क्यों उठ रही मांग?

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कोरोना की दूसरी लहर के बीच संक्रमण के अलग-अलग वेरिएंट्स पाए जाने के बाद अब कोरोना की वैक्सीन की दोनों डोज के बीच अंतर को कम करने को लेकर मांग उठने लगी है. बीते मई महीने में केंद्र सरकार द्वारा वैक्सीनेशन की गाइडलाइन्स में कोविशील्ड टीके के दोनों डोज के बीच 12 से 16 हफ्ते का अंतर दिया गया था. उसी वक्त ब्रिटेन में आबादी के कुछ हिस्से के लिए वैक्सीन के दोनों डोज में अंतर को घटाकर 12 हफ्ते से 8 हफ्ते कर दिया था. ब्रिटेन ने यह फैसला तब किया जब वहां संक्रमण के नए वैरिएंट्स पाए गए.

देशों में वैक्सीन की दो डोज के बीच अंतर पर फैसला कैसे किया गया, इस पर अलग-अलग शोध किए गए हैं. पहले दो खुराक के बीच 12 सप्ताह के अंतराल के बाद ब्रिटेन ने पिछले महीने कहा कि जिन लोगों को ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की पहली खुराक मिली है वे 12 की जगह 8 हफ्ते के भीतर ही दूसरी डोज भी लगवा लें. उसी समय भारत ने कोविशील्ड के अंतराल को बढ़ाकर 12 सप्ताह कर दिया.


ब्रिटेन में दो खुराक के बीच के अंतर को बढ़ाने के बाद विवाद

शुरुआती दिनों में ब्रिटेन में दो खुराक के बीच के अंतर को बढ़ाने के बाद विवाद शुरू हो गया था. विशेषज्ञों ने डेटा का हवाला देते हुए कहा कि बेहतर इम्यूनिटी रिस्पॉन्स के लिए लगभग 3 महीने का अंतर होना चाहिए. दूसरे डोज के लिए अधिक अंतर को इसलिए भी मददगार माना गया ताकि देश की बड़ी आबादी को कम से कम वैक्सीन की एक डोज तो लग जाए.

ब्रिटेन में B.1.617.2 वैरिएंट के मामले बढ़ने के बीच देश के स्वास्थ्य अधिकारियों ने 50 वर्ष से अधिक आयु की आबादी और कम अंतराल के साथ टीकाकरण के लिए कॉमरेडिडिटी वाले लोगों को प्राथमिकता देने का फैसला किया. यह निर्णय उस स्टडी पर आधारित था जिसमें पाया गया कि ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका और फाइजर के टीके पहली खुराक के बाद डेल्टा संस्करण के पर केवल 33 प्रतिशत प्रभावी थे. वहीं फाइजर की दो खुराक के बाद एफिकेसी 88 प्रतिशत हो गई वहीं ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के दोनों डोज के बाद 60 प्रतिशत असरदार होता.


डेल्टा वेरिएंट की वजह से हिंदुस्तान में बढ़े मामले

वहीं, भारत में नई दिल्ली में नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) और सीएसआईआर इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि राष्ट्रीय राजधानी में मामलों में तेजी कोरोना के डेल्टा वैरिएंट के कारण हुई थी. अध्ययन में कथित तौर पर पाया गया कि डेल्टा वैरिएंट, अल्फा वैरिएंट या B.1.1.7 या यूके वैरिएंट की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक तेजी से फैला सकता है. यह भारत में कोविड के मामलों में वृद्धि का कारण बना था.

इसके साथ ही कहा गया कि पहले कोरोना संक्रमित हो चुके लोग या फिर टीके की एक डोज लगवा चुके लोग भी इस डेल्टा वेरिएंट से पूरी तरह सुरक्षित नहीं. रिसर्चर्स ने कहा कि वैक्सीन लगवाने के बाद भी संक्रमित हुए ज्यादातर मरीजों डेल्टा वेरिएंट ही पाया गया.

दूसरी ओर कोलकाता स्थित द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि भारत को खुराक के बीच के अंतर का फैसला इस आधार पर करना चाहिए कि नया वैरिएंट कैसा व्यवहार करता है. वहीं केंद्र दो अलग-अलग टीकों से डोज को मिक्स करने पर भी स्टडी कर रहा है. इसके साथ ही कोविशील्ड के एक डोज के असर पर भी स्टडी चल रही है.

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