संसद की गरिमा क्यों तार-तार कर रहे हैं?

0
151

भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

संसद का शीतकालीन अधिवेशन 29 नवंबर से शुरू हुआ, प्रधानमंत्री की पूर्व घोषणा के अनुसार कृषि कानून को संसद की पटल में लाया गया, लेकिन विरोधी सांसदों की मांग थी कि बिल पर बहस हो, पता चले कि इन बारह महीनों में कानून बनने के बाद जनता में इसकी प्रतिक्रिया क्या थी और किन कारणों से बिल रद्द करना पड़ा. यह बात विरोधी दलों की जायज थी, क्योंकि संसद में उनकी यदि उपस्थिति है, तो उनको बोलने का अवसर जरूर दिया जाना चाहिए. लेकिन ऐसा न करके स्पीकर महोदय ने फटाफट बगैर किसी बहस के ध्वनि मत से बिल को रद्द कर दिया. यह राष्ट्रीय पंचायत है. यह हमारे देश का मॉडल है-कानून बनाने के लिए, इसकी ध्वनि और दृष्य देश की संपूर्ण जनता देखती है, देश ही नहीं विश्व भी लोकतंत्र की सीख दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रात्मक देश से सीखना चाहता है. इसका हमें गर्व होना चाहिए था और सारी डिबेट पक्ष और विपक्ष की होने देते, ताकि संसदात्मक प्रणाली की प्रेरणा उन मुल्कों को भी मिलती, जहां पर तानाशाही प्रणाली चल रही है, पर ऐसा नहीं होने दिया. घटना सिर्फ यही नहीं, पहले भी संसद की स्वयं सांसदों के साथ हाऊस को चलाने वाले अध्यक्ष की एक तरफा कार्य प्रणाली से कानून निर्माताओं की स्थिति को देश देखता आया है. गरिमामय दृश्य बहुत ही कम समय में संसद का दिखता है, नहीं तो हो-हल्ले के बीच क्या कैसे कानून की बारीकियों को, जो कानून बन रहा है, तैयार होगा. सोचने का विषय है. इसी लिए संसद की गरिमा को बनाए रखने के लिए बहुमत वाले दल जिसकी सरकार है, उसके सदस्य को स्पीकर की कुर्सी के लिए उपयुक्त समझा गया है, ताकि हाऊस का काम-काज सही ढ़ंग से चले. यह तो सैद्धांतिक बात हुई, पर व्यवहार में स्पीकर का झुकाव सत्ता पक्ष की ओर ज्यादा रहता है, जिसके कारण नोक-झोंक के अलावा हाथापाई के दृश्य देखने को ज्यादा मिलते हैं. आजकल संसद की ऐसी ही दशा देखने को देश के लोगों को मिल रही है-

लोक सभा का दृश्य

स्पीकर ने जैसे ही कृषि बिल को निरस्त करने के लिए घोषणा की, उसके लगभग पांच मिनट बाद लोकसभा ने ध्वनिमत से रद्द कर दिया. विपक्ष को आवाज उठाने का अवसर ही नहीं दिया गया. क्या यह स्पीकर का निष्पक्ष कार्य था? नहीं, इस मामले में स्पीकर को एकदम निष्पक्ष भाव से सदन को चलाना चाहिए. पक्ष और विपक्ष को बोलने का अवसर देना चाहिए. यदि ऐसा किया होता, तो स्पीकर की गरिमा के साथ, सदन की गरिमा भी बनी रहती. यह सोचने का विषय है कि हम अपनी वर्तमान और भावी पीढ़ी को कैसा संदेश दे रहे हैं?

राज्य सभा का दृश्य

राज्य सभा वरिष्ठ जनों का हाऊस माना जाता है. इसमें कहीं भी वरिष्ठता की झलक 29 तारीख से लेकर आज तक नहीं दिखी. वरिष्ठता के साथ-साथ राज्य सभा की कार्यवाही को चलाने के लिए देश का उपराष्ट्रपति होता है. उसकी गरिमा सर्वोच्च होती है. क्योंकि हम और हमारे बच्चे उनका अनुसरण करते हैं, लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिला. पहले तो गलती सदन के अध्यक्ष से ही हुई है. उन्हें बिल पर बहस करने की अनुमति देनी चाहिए थी. चाहे एक-एक मिनट की ही क्यों न होती, ताकि वरिष्ठ जनों के विचार देश सुनता और देखता, पर ऐसा नहीं हुआ. लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन सदस्यों की भी थी, जो पर्चे फाड़-फाड़ कर अध्यक्ष की ओर फेंक रहे थे. देश की जनता को यह कैसा संदेश दे रहे थे कि हम बहुत ही काबिल लोग हैं?

इतने गरिमामय सदन राज्य सभा का बड़ा हास्यास्पद दृश्य था. हमने दुनिया को अपना रूप इस तरह से दिखाया. जोकि नहीं होना चाहिए था, इन तरीको को अपनाकर हम लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा रहे थे.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here