यह महंगाई कहां ले जाएगी?

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भगवती प्रसाद डोभाल

देश ने 2014 में कांग्रेस से पीछा छुड़ाने के लिए केंद्र में सरकार ही बदल डाली. भाजपा के एक नारे- ‘अच्छे दिन आंएंगे,’ ने उसे शिखर पर पहुंचाया. जनता को आज लगता है उसे भ्रमित किया गया. सात साल पहले जब से मोदीजी को सत्ता मिली, तब से एक भी दिन ऐसा नहीं आया कि जनता के लिए बाजार में वस्तुएं सस्ती हुई होंगी. कल ही फिर जनता के चूल्हों पर पानी डाल दिया गया है. एलपीजी के दाम बढ़े, सीएनजी के दाम बढ़े, पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़े, यह सिलसिला कई सालों से जारी है.

कल ही एक वीडियो कांफ्रेसिंग में प्रधानमंत्री मोदीजी बोल रहे थे कि हमने जनता को उज्ज्वला योजना के भीतर 9 करोड़ सिलिंडर बांटे और ठीक इन्हीं क्षणों में रसोई गैस के दाम और आकाश में पहुंचा दिए. आज घरेलू गैस के दाम हजार रुपए से अधिक हो गए. अभी तक हम यह सुनते आए थे कि जनता उन सिलिंडरों का क्या करेगी, जिसे भरने के लिए लोगों के पास पैसा ही नहीं है? वास्तव में आज लोगों की ऐसी स्थिति हो गई कि उन्होंने सिलिंडर ही फेंक दिए. कैसे वह अपनी रसोई को चालू रखेंगे? यह समस्या विकराल हो गई है. जलाने की लकड़ी की वैसे ही तंगी है. कहा गया था कि माताओं और बहनों के धुएं से भरे आंसुओं को, हम गैस के सिलिंडर देकर, पोंछ देंगे. पर ऐसा होने का कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे हैं, उल्टे गरीब आदमी को चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी, कोयले की ओर जबरन वापस मुड़ना पड़ रहा है.


अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल डीजल सस्ता!

यह भी एक संयोग ही है, जब से मोदी जी ने केंद्र में पैर रखा, तब से विश्व बाजार में पेट्रोल के दाम घटते चले गए, पर भारत देश में इसका फायदा आम जन को नसीब नहीं हुआ. इन सात वर्षों में रसोई गैस के दाम दुगने से ज्यादा हो गए! वैसे ही पेट्रोल उछाल मार रहा है. डीजल भी महंगाई के साथ आगे बढ़ रहा है. सोचिए! यह हालत ऐसी ही रही, तो देश में हर वस्तु के दाम शिखर छुएंगे. खेती के कामों में डीजल, पेट्रोल की जरूरत पड़ती है. किसान का काम उसके बगैर संभव नहीं है, यहां तक कि कू्रड आयल से खाद भी बनाई जाती है. यानी कि सारा देश इस महंगाई से पिस रहा है, पर माननीय प्रधानमंत्री जी के मुंह पर शिकन तक नहीं है कि यह सब कैसे हो रहा है. कब तक जनता इस महंगाई के जुर्म को पीठ पर लादकर चलती रहेगी. आखिर क्या विद्रोह के लिए मोदीजी रास्ता साफ कर रहे हैं?


मोदीजी ने कांग्रेस को कैसे हटाया?

2014 में आकर्षित नारे तो आयात किए गए थे, साथ ही वह अपने भाषणों में कांग्रेस को खरी खोटी बातें भी सुना रहे थे, पुराने चुनाव प्रचार में महंगाई के मुद्दे पर ही मोदीजी सत्ता पर काबिज हुए. अपने चुनावी नारों पर एक बार मुड़ कर गौर करें, तो आपको स्वयं ही आभास होगा कि ऐसी स्थिति में जनता कब तक ऐसे वचनों को सहन करती रहेगी.

लोग बहुत सारे कारणों से त्रस्त हैं-जैसे नोटबंदी, जीएसटी आदि. नोटबंदी से परिवारों में पोटलियों में छुपाए मां बहनों की आपातकालीन तिजोरी टूट गई, अब उनके पास ऐसा कोई धन नहीं है, जिससे वे अपने कठिन समय को निकाल सकें. लेकिन यह शायद उनका स्नेह होगा जिसकी वजह से वे इसे जबान पर लाने से कतराते हैं,, पर यह स्नेह कब तक बना रहेगा? सब्र का बांध टूटने में देरी नहीं होगी. आज के जमाने में परिवार में ही थोड़ी कठिनाई आने पर, परिवार बिखरने शुरू हो जाते हैं, फिर यह तो विशाल देश का मामला है, क्या इसे हैंडिल करना आसान होगा?

सर तेज बहादुर सप्रू ने कहीं कहा था, ‘कुर्सी पाना तो सरल है, पर उस पर कोई कितने समय तक टिके रह पाएगा , वह उस दौरान किये गए कार्य बताएंगे’.

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