पाकिस्तान के कई शहरों में भड़की हिंसा, 7 लोगों की मौत, सैकड़ों घायल, जानिए क्यों बने गृह युद्ध जैसे हालात?

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बीते तीन दिनों से इमरान के नए पाकिस्तान की सड़कें जंग का मैदान बनी हुई है. सबसे ज्यादा हालात लाहौर शहर की खराब है. हजारों की तादात में प्रदर्शनकारी सड़कों पर डटे है. पुलिस और सुरक्षा बलों की इस्लामिक कट्टरपंथियों के बीच हिंसा में अबतक सात लोगों की जान जा चुकी है. यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि अभी तक इसको लेकर कोई आधिकारिक सूचना सामने नहीं आई है. सोशल मीडिया पर #CivilWarinPakistan ट्रेंड कर रहा है. इस हिंसा झड़प में दो पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है जबकि तीन सौ से ज्यादा लोगों जख्मी बताए जा रहे हैं. आखिर पाकिस्तान की सड़कों पर गदर जैसे हालात क्यों बनें. आइए इसको समझते हैं.

पूरी दुनिया में अपना वर्चास्व कायम रखने के लिए पाकिस्तान मजहबी कट्टरता और आतंकवाद जैसे दैत्यों का पालन-पोषण करता आया है. वही अब भस्मासुर की तरह उसे ही झुलसा रहा है. इसी असली वजह समझने के लिए पाकिस्तान के मजहबी कट्टरपंथ और आतंकवाद के खेल को विस्तार से समझने की जरूरत है. जिस दिन जिन्ना के पाकिस्तान का सूर्यउदय हुआ उस दिन से ही पाकिस्तान इस्लामिक कट्टरता का मसीहा बन गया. वक्त बीतने के साथ ही हिंदुस्तान से आगे बढ़ने की चाह में पाकिस्तान आतंकवाद का इस्तेमाल करने लगा, जो अब भी जारी है. जिन्ना के पाकिस्तान के लिए यह कहावत सटीक बैठती है, जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है वो खुद ही एक दिन उस गड्ढे में गिर जाता है. पाकिस्तान को शायद यह इल्म नहीं रहा होगा कि जिस आतंकवाद को वो पाल रहा है वहीं एक दिन उनके लिए नासूर साबित होगा. हिंदुस्तान को अपने इशारों पर नचाने का सपना देखने वाले पाकिस्तान, जिस आतंकवाद के बलबूते कूद रहा था आज वहीं आतंकवाद पाकिस्तान को दीमक की तरह चाट रहा है और पाकिस्तान झुलस रहा है.

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होए

जम्मू-कश्मीर पर अपना हक जताने वाले पाकिस्तान ने जिन्ना की धरती पर आतंकवाद का जो पेड़ बोया था आज वहीं पेड़ उसको कांटों की तरह चुभने लगा है, फिर भी शायद ही वह सबक लें क्योंकि उसकी फितरत ही मजहबी कट्टरता और आतंकवाद को टूलकीट की तरह इस्तेमाल करने आदत है. अगर अब भी पाकिस्तान नहीं सुधरा तो शायद आने वाले वक्त में पाकिस्तान दुनिया के नक्शे से गायब होने में देरी नहीं लगेगी. मगर ऐसा लगता नहीं है, अगर सुधरना होता तो 2014 में पेशावर के स्कूल में आतंकी हमले में हुए बालसंहार के बाद आतंकवाद को समर्थन देना बंद कर दिया होता, मगर जो सुधर जाए वह पाकिस्तान नहीं होता सकता. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आंखों में धूल झोंकने और खुद को एफएटीएफ की तरफ से ब्लैकलिस्ट किए जाने से बचने के लिए वक्त-वक्त पर घड़ियाली आंसू रोते हुए आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का झूठा ढोंग रचता रहा है. पाकिस्तान की इन हरकतों से मजहबी कट्टरपंथी तत्वों का हौंसला लगातार बढ़ता रहा है. इस बार भी वहीं मजहबी कट्टरपंथी पाकिस्तानी सरकार की ईंट से ईंट बजा रहे हैं.

जानिए पाकिस्तान में मचे गदर का पूरा मामला

मैदान-ए-जंग बने पाकिस्तान की सड़कों पर जो हालात है उसकी असल वजह फ्रांस की पत्रिका में बीते साल छपे पैगंबर के विवादित कार्टून है. कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने इमरान सरकार को फ्रांस के राजदूत को तत्काल वापस भेजे जाने के लिए 20 अप्रैल की डेडलाइन दी थी. ऐसा नहीं होने पर 20 अप्रैल से देशभर में उग्र प्रदर्शन की चेतावनी दी थी. लेकिन उससे पहले ही सोमवार को टीएलपी के मुखिया मौलाना साद हुसैन रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया. उसकी गिरफ्तारी से उसके समर्थक भड़क गए और सड़कों पर उतर गए. जगह-जगह पथराव, तोड़फोड़ और आगजनी करने लगे. सेना, पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ प्रदर्शनकारियों की हिंसक झड़पें होने लगी. इसी बीच बीते बुधवार (14 अप्रैल) को पाकिस्तान सरकार ने तहरीक-ए-लब्बैक को आतंकवाद रोधी कानून के तहत प्रतिबंधित करने का ऐलान कर दिया. गृह मंत्री शेख राशिद ने पत्रकारों से कहा कि तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) को 1997 के आतंकवाद रोधी अधिनियम के नियम 11-बी के तहत प्रतिबंधित किया जा रहा है, उन्होंने कहा, ‘मैंने टीएलपी पर प्रतिबंध लगाने के लिये पंजाब सरकार की तरफ से भेजे गए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.’ इस ऐलान के बाद कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के कार्यकर्ता और भड़क गए हैं. दूसरी तरफ सेना और पुलिस भी बलपूर्वक उनके दमन में लग गई हैं.

मजहबी आकाओं को खुश करने के लिए इमरान सरकार ने किया था समझौता

आज तहरीक-ए-लब्बैक के खिलाफ प्रतिबंध का पैंतरा खेलने वाली पाकिस्तान की इमरान सरकार ने इसी के सामने पिछले साल घुटने टेके थे. फ्रांस की एक पत्रिका में मुहम्मद साहब के विवादित कार्टून छपे थे. इसके खिलाफ टीएलपी ने नवंबर में जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन किया था. उसने मांग की कि पाकिस्तान से फ्रांसीसी राजदूत को निकाला जाए और फ्रांस से किसी भी चीज के आयात पर रोक लगाई जाए. इमरान खान सरकार ने तब ना सिर्फ फ्रांसीसी राजदूत को निकालने की हामी भरी बल्कि मौलाना साद हुसैन रिजवी के साथ बाकायदे एक करार पर दस्तखत भी किए गए और फरवरी 2021 तक राजदूत को निकालने का विश्वास भी दिलाया था. हालांकि इसके बाद विरोध-प्रदर्शन शांत हो गया. मामला ठंडा पड़ने के बाद समझौते को 20 अप्रैल तक बढ़ा दिया गया. आखिरकार तहरीक-ए-लब्बैक ने इमरान खान सरकार को चेतावनी दे दी कि वह 20 अप्रैल तक इंतजार करेगी, अगर तब तक फ्रांसीसी राजदूत को नहीं निष्कासित किया गया तो वह देशभर में फिर से प्रदर्शन करेगी.s

जानिए कौन हैं मौलाना साद हुसैन रिजवी और तहरीक-ए-लब्बैक

साद रिजवी एक कट्टरपंथी मौलाना है. वह खादिम हुसैन रिजवी का बेटा है, जिसकी कुछ महीने पहले रहस्यमय हालात में मौत हो गई. खादिम हुसैन रिजवी वही मौलाना था जिसने 2017 में इस्लामाबाद शहर की कई दिनों तक नाकेबंदी की थी. उसके समर्थकों ने इस्लामाबाद के पास फैसलाबाद चौराहे पर तीन सप्ताह तक विशाल विरोध-प्रदर्शन किया था.

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