पुरुषों के लिए Pollution बना सबसे बड़ा खतरा! एक स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

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बढ़ती आबादी और संसाधनों के साथ ही देश-दुनिया में प्रदूषण का स्तर दिन-बा-दिन घटता जा रहा है. प्रदूषण इंसानों के लिए महामारी का खतरा तो है ही, लेकिन उससे ज्यादा घातक भी. दरअसल, एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि प्रदूषण की वजह से इंसानों के प्राइवेट पार्ट (लिंग) का आकार छोटा हो रहा हैं यानी सिकुड़ रहा हैं. यह खुलासा न्यूयॉर्क के माउंट सिनाई हॉस्पिटल की एक अध्ययन में हुआ है. इस अध्ययन के मुताबिक प्रदूषण का स्तर बढ़ने की वजह से पुरुषों के प्राइवेट पार्ट (लिंग) का आकार छोटा होता जा रहा है. बच्चे विकृत जननांगों के साथ पैदा हो रहे हैं. चालिए जानते हैं इस हैरान कर देने वाले अध्ययन में और क्या-क्या खुलासे किए गए है?

बता दें, साल 2019 में प्रदूषण की वजह से भारत में तकरीबन 17 लाख लोग अपनी जान गवां चुके है. जबकि, पूरी दुनिया में हर साल 42 लाख लोग प्रदूषण की वजह से दम तोड़ देते है, अगर प्रदूषण का स्तर ऐसे ही बढ़ता रहा तो मानव जाति के लिए कई नए खतरनाक बदलाव होंगे. माउंट सिनाई हॉस्पिटल में एनवॉयरॉनमेंटल मेडिसिन और पब्लिक हेल्थ की प्रोफेसर डॉ. शान्ना स्वान के मुताबिक सिर्फ प्राइवेट पार्ट (लिंग) का आकार ही छोटा नहीं हो रहा है. बल्कि इंसान की प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ रहा है.

डॉ. स्वान ने कहा कि ये इंसानों के लिए अस्तित्व संबंधी संकट है. उन्होंने बताया कि स्टडी में एक ऐसे खतरनाक रसायन की पहचान हुई है जो इंसानों की प्रजनन क्षमता को कम कर रहा है, साथ ही इसकी वजह से लिंग छोटे और सिकुड़ रहे हैं. बच्चे विकृत जननांगों के साथ पैदा हो रहे हैं. प्रदूषण को लेकर डॉ. स्वान ने पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को ट्वीट भी किया है. इसमें उन्होंने कहा है कि प्रदूषण के मामले में मैं ग्रेटा के साथ हूं.

इस रसायन का नाम है फैथेलेट्स. इस केमिकल का उपयोग प्लास्टिक बनाने के लिए होता है. इसकी वजह से इंसान के एंडोक्राइन सिस्टम पर पड़ता है. इंसानों में हॉर्मोंस के स्राव एंडोक्राइन सिस्टम के जरिए ही होता है. प्रजनन संबंधी हॉर्मोंस का स्राव भी इसी सिस्टम से होता है. साथ ही जननांगों को विकसित करने वाले हॉर्मोंस भी इसी सिस्टम के निर्देश पर निकलते हैं.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. स्वान ने बताया कि प्रदूषण की वजह से पिछले कुछ सालों में जो बच्चे पैदा हो रहे हैं, उनके लिंग का आकार छोटा हो रहा है. उन्होंने इस मुद्दे पर एक किताब लिखी है. जिसका नाम है काउंट डाउन. किताब में आधुनिक दुनिया में पुरुषों के घटते स्पर्म, महिलाओं और पुरुषों के जननांगों में आ रहे विकास संबंधी बदलाव और इंसानी नस्ल के खत्म होने की बात कही गई है.

डॉ. स्वान ने फैथेलेट्स सिंड्रोम की जांच सबसे पहले तब शुरू की जब उन्हें नर चूहों के लिंग में अंतर दिखाई दिया. उन्हें दिखाई दिया सिर्फ लिंग ही नहीं मादा चूहों के भ्रूण पर भी असर पड़ रहा है. उनके प्रजनन अंग छोटे होते जा रहे हैं. तब उन्होंने फैसला किया कि वो इंसानों पर अध्ययन करेंगी.

स्टडी के दौरान उन्हें पता चला कि इंसानों के बच्चों में भी ये दिक्कत आ रही है. उनके जननांग छोटे और विकृत हो रहे हैं. एनोजेनाइटल डिस्टेंस कम हो रहा है. यह लिंग के वॉल्यूम से संबंधित समस्या है. फैथेलेट्स रसायन का उपयोग प्लास्टिक बनाने के काम आता है. ये रसायन इसके बाद खिलौनों और खाने के जरिए इंसानों के शरीर में पहुंच रहा है.
फैथेलेट्स शरीर के अंदर एस्ट्रोजेन हॉर्मोन की नकल करता है. उसके बाद शरीर के अंदर शारीरिक विकास संबंधी हॉर्मोन्स की दर को प्रभावित करता है. इसी वजह से शरीर के ये जरूरी अंग बिगड़ते जा रहे हैं.

इससे पहले साल 2017 में एक स्टडी आई थी, जिसमें दावा किया गया था कि पश्चिमी देशों में पुरुषों के स्पर्म काउंट में 50 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. पिछले चार दशकों में इस तरह की 185 स्टडीज हुई हैं. जिनमें 45,000 स्वस्थ पुरुषों को शामिल किया गया था. उनके स्पर्म काउंट में हर दशक के बाद कमी दर्ज की गई.

डॉ. स्वान कहती हैं कि अगर इसी तरह प्रजनन दर कम होता रहा तो दुनिया में मौजूद ज्यादा पुरुष साल 2045 तक पर्याप्त स्पर्म काउंट पैदा करने की क्षमता खो देंगे. यानी नंपुसकता की ओर बढ़ जाएंगे.

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