सुप्रीम कोर्टः न्याय के नाम पर कुछ तो निपटाओ!

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

पिछले लेख में हमने उल्लेख किया था कि अदालतों के पास करोड़ों मुकदमें न्याय पाने के लिए लंबित पड़े हैं, उनका पूछनेवाला सिर्फ राम ही है. कब निपटेंगे? कुछ पता नहीं है. इसी प्रसंग में सुप्रीम कोर्ट ने कल अपनी एक और खीज का इजहार माननीय सरकार से किया. मसला था-उपभोक्ता संरक्षण एक्ट. यह एक्ट देश में उपभोक्ताओं को ब्यापारी एवं उस उत्पाद निर्माता कंपनी के गलत कारनामों को, जिसे वह बाजार में बेच रहा है-गलत-सलत ढ़ंग से, उसे दंडित करने का अधिकार देता है. लेकिन उस कानून के अभी तक दांत नहीं आए हैं. कहने का मतलब है कि पूरे देश में उपभोक्ताओं को संरक्षण देने के लिए, जो अदालतें गठित होनी चाहिए थीं, उसके लिए सरकार सोई हुई है. इस सारी स्थिति पर कोर्ट इंतजारी में है कि सरकार ट्रिब्यूनल का गठन करेगा, तो उससे मुकदमों का बोझ कम होगा. लेकिन ऐसा न देखते हुए मजबूरन कहना पड़ा कि उस उपभोक्ता संरक्षण एक्ट को समाप्त कर दो.


ताज्जुब सरकार क्यों देरी कर रही है!

जब संसद ने उपभोक्ता संरक्षण एक्ट पास किया है, तब उसके गठन में देरी क्यों हो रही है? यह विदित ही है, कंज्यूमर देश में हर सेकंड ठगे जाते हैं. उत्पादक जितना पैसा अपने विज्ञापन पर खर्च करता है, उतना यदि वह अपने उत्पाद की गुणवत्ता पर खर्च करे तो ग्राहक खुद ही उस प्रोडक्ट की मार्केट में आने की इंतजारी करेगा. उसे सिर्फ विज्ञापन का इस्तेमाल परिचय भर के लिए करना होता, पर ऐसा नहीं है. हजारों, लाखों कंपनियां बाजार में ऐसी आ रही हैं, जो अपने उत्पाद में, उसमें लिखे हुए साहित्य से इतर होती हैं. बेचारा उपभोक्ता अनजाने में तो नए प्रोडक्ट को खरीद तो लेता है, पर उसे लौटाने में यदि वह खराब है तो अधिकांश कंपनियां मना कर देती हैं.


दुनियाभर के उत्पाद गुणवत्ता में खरे नहीं!

आप किसी भी क्षेत्र को देखें, उत्पादन बड़ी तेजी से हो रहा है, पर उनकी गुणवत्ता में नियंत्रण नहीं है. कास्मेटिक का बाजार तेजी से उभर रहा है, सुंदर दिखना सबके लिए जरूरी हो गया है, चाहे प्रकृति ने उसे कमियां लेकर पैदा किया हो. उन कमियों को छुपाने के लिए तरह-तरह के रसायन बाजार में हैं, ग्राहक बगैर सोचे समझे बाजार में आए उत्पाद-सौंदर्य प्रसाधन को आनन-फानन में खरीद लेता है, पर उससे होने वाले साइड इफैक्ट को नहीं जानता. वह तब ही पता चलता है, जब उसका इस्तेमाल कर लेता है.


खाद्य पदार्थ भी

ऐसा ही खाद्य पदार्थों के साथ भी हैं. सौंदर्य प्रसाधन में उपयोग के लिए की जाने वाली वस्तु, तो शरीर के बाह्य भाग पर ही लगाई जाती है, लेकिन खाने वाले खाद्य पदार्थ तो सीधे ही शरीर में चले जाते हैं. इसके नकारात्मक असर को रोकने के लिए ही उपभोक्ता संरक्षण एक्ट को काम करना है. अभी हमारे देश में उपभोक्ता उतना सजग नहीं है, जितना विदेशी उपभोक्ता है, वह हर वस्तु को सोच-समझकर उसके गुणवत्ता के आधार पर लेता है, इसी लिए विदेशी माल की क्वालिटी में शून्य प्रतिशत कमी की संभावना रहती है. इसी संदर्भ में एक बार विदेश से शिक्षित गुणवत्ता एक्सपर्ट व्यक्ति से बात हो रही थी, उनका कहना था कि उत्पाद के प्रोडक्शन में कमियों की गुंजाइश शून्य होती है, जबकि भारत में ‘चलता है का जुमला अधिकांश कारखानों लागू होता है.

इन्हीं कमियों को सुधारने के लिए उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता हमें है. इसी का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि जब आप न्यायालय ही नहीं गठित कर सकते, तब उस उपभोक्ता संरक्षण एक्ट को मिटा ही क्यों न देते, क्यों उसे कानून बुक में रखा हुआ है.

सरकार को कोर्ट की पीड़ा ही नहीं, सभी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को देखते हुए ऐसे न्यायालयों का गठन तेजी से करना चाहिए.

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