शासक को हर अपने फैसले पर फिर से सोचना चाहिएः सुप्रीम कोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश एनवी रामना के विचार

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के यह विचार कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने देश के प्रधानमंत्री या उन जैसे शासक को फैसला लेते समय पुर्नविचार करना भी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रामना ने महाभारत और रामायण के प्रसंगों को देश के संदर्भ में कहे. यह हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी परोक्ष रूप से संकेत है. वह आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में श्री सत्य साई इंस्टीट्यूट ऑफ हायर लर्निंग पुट्टापर्थी शहर के एक समारोह में बात कर रहे थे . वहां पर ही प्रधान न्यायधीश को यह शब्द कहने पड़े. लगता है कि उनके पास प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए आदेशों की श्रंखला रही होगी, जहां उन्हें ऐसे आदेशों पर न्याय देने के लिए बाध्य होना पड़ा हो. ऐसे सीधे विचार अभी तक किसी न्यायपालिका के शीर्ष व्यक्ति द्वारा नहीं कहे गए हैं. वह कहते हैं कि शासक को महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्ग के सम्मान को किसी भी कीमत पर बचाना चाहिए. न्यायपालिका, जो लोकतंत्र का एक प्रमुख स्तंभ है, जिसका काम ही सरकार के आदेशों की व्याख्या करना है, और आए दिन न्यायालय को उन गलत आदेशों पर, जनता जो उनके संज्ञान में लाती है, उनको भी अपनी टिप्पणी के साथ निरस्त करना पड़ता है, जो जनता को हानि पहुंचाने वाले हों. संविधान के दायरे में किए गए सरकार के फैसलों को ही सुप्रीम कोर्ट जायज ठहराता है. देखिए परिस्थितियां-

आए दिन महिलओं पर अत्याचार

आज आए दिन हर अखबार और मीडिया देशभर में हो रहे महिलाओं पर अत्याचार का प्रसारण करता है. कोई भी समाचार बुलेटिन ऐसा नहीं होगा, जहां महिलाओं पर हो रहे घिनौने अत्याचार को न प्रसारित करता हो. ज्यादातर अखबारों की सुर्खियां इन्हीं अत्याचारों से भरी पड़ी रहती हैं.

बाल शोषण की खबरों की भरमार

देश और राज्य के प्रशासकों की ढ़ील के ही कारण बाल शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं. इन पर शक्ति से काम नहीं होता, जिसके कारण अपराध दिन प्रति दिन बढ़ ही रहे हैं.

कमजोर वर्ग की स्थिति नाजुक

जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली, तब से कमजोर वर्ग और कमजोर होता चला जा रहा है, उसकी आर्थिक हालात माली होती जा रही हैं. पिछले कांग्रेस सरकार में गरीबी रेखा से लोग उठे थे मध्यम वर्ग की तरफ बढ़ रहे थे, लेकिन अब स्थिति वह नहीं हैं. जनता गरीबी रेखा के नीचे मध्यम वर्ग से तेजी से खिसक रही है. कहीं न ठहराव है और न विकास हो रहा है. आंकड़े सभी के सामने हैं. वर्तमान शासक यानी मोदीजी को इस पर संज्ञान लेना चाहिए. अभी उनके पास तीन वर्ष का कार्यकाल बचा है, इस कार्यकाल को उन्हें कमजोर वर्ग को ऊपर उठाने में काम करना चाहिए. तभी आने वाले 2024 के चुनाव में अपने आपको या किसी अपने पार्टी के सदस्य को गद्दी सौंप पाएंगे.

किसानों का मुद्दा

पिछले 12 महीनों से पूरा देश किसान अंदोलन में व्यस्त रहा. किसान अपनी मांग तीन कानूनों को रद्द करने के लिए अड़े थे, क्योंकि यह कृषि कानून किसानों को विश्वास में लिए बगैर ही संसद में पारित कर कानून बना दिए गए. जनता की राय भी इन कानूनों के पक्ष में नहीं थी, पर प्रधानमंत्री जी अड़े थे कि कानून अच्छे हैं. आखिर 12 महीनों में 750 किसानों को शहीद करवाकर ही देश के प्रशासक महोदय को भान हुआ कि कानून ठीक नहीं हैं. इसमें भी नहीं मानते, यदि राज्यों के चुनाव सामने नहीं होते, अपनी हार देखते हुए उन्हें यह कानून निरस्त करने पड़े. यहां पर यह सब कहने का आशय यही है कि प्रधानमंत्री को अपने गलत किए गए निर्णय पर एक साल बाद आभास हुआ, ऐसा कार्य किसी अच्छे प्रशासक का उदाहरण नहीं है. हो सकता है इसी बात पर मुख्य न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी सार्वजनिक की हो.
बहुत सारे निर्णय जो जनता के अनुकूल नहीं हैं

जनता के अनुकूल नोटबंदी कानून भी नहीं था, उससे देश को बहुत नुकसान हुआ है. देश अभी भी उसकी मार झेल रहा है. छोटे-मोटे धंधे अर्थाभाव में खत्म हो गए. मार्केट में बिजनेस करने के लिए धन की जरूरत होती है. वह सब गायब हो गया. कारीगर भी अपना काम संभाल पाने मे अभी भी असमर्थ हैं.

GST भी गलत ढ़ंग से सामने आया

जीएसटी एकदम लागू करने से स्वयं सरकार और जनता को इससे जूझना पड़ा है. कितनी ही बार सरकार को फेरबदल करनी पड़ा. अभी तक एक अच्छा जीएसटी का रूप सामने नहीं आ पाया.

इन सब पर एक अच्छे प्रशासक को अपनी गलतियों को भी मान लेना चाहिए कि क्या गलत हुआ और क्या सही, उसी के आधार पर संशोधन करने की खिड़की खुली होनी चाहिए न कि अपने को ही श्रेष्ठ बुद्धि का मान कर बुरे कानून को भी अच्छा बताना होशियारी भरा काम नहीं है.

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