बंगाल विधानसभा चुनाव: गूंजा- चाहीं ना चाहीं ना बीजेपी के चाहीं ना- ममता बनर्जी के नये स्लोगन का जानिए अर्थ और असर

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बंगाल की सत्ता को लेकर बीजेपी और राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी के बीच घमासान जोरों से चल रहा है. दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. सीएम ममता बनर्जी ने ऐसे में हाथ में माइक थामकर पार्टी का स्लोगन सुनाया. उन्होंने कहा, चाहीं ना चाहीं ना बीजेपी के चाहीं ना.

ममता ने कहा कि टीएमसी का विकल्प कोई है तो वह केवल टीएमसी है. बीजेपी दंगे कराना चाहती है पर हम शांति. इसी वजह से हमारा स्लोगन है -चाहीं ना चाहीं ना दंगा के चाहीं ना. चाहीं ना चाहीं ना लुटेरा के चाहीं ना. चाहीं ना चाहीं ना भ्रष्टाचार के चाहीं ना. ममता ने अपने पार्टी वर्करों से कहा कि वे अपना मनोबल ऊंचा रखकर चुनाव मैदान में जाएं और बीजेपी के असली चेहरे को बेनकाब करें.

2021 में पांच राज्यों में चुनाव होने हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण चुनाव की बात करें तो वह राज्य है पश्चिम बंगाल. ममता बनर्जी के 10 सालों के शासनकाल के बाद क्या जनता एक बार फिर से उन्हें मौका देगी या बीजेपी राज्य में सरकार बनाएगी, यह चुनाव परिणाम तय करेंगे, लेकिन दोनों दलों के बीच जमकर मार-काट मची है. 15 सालों के लेफ्ट शासन को हराकर राज्य में टीएमसी की सरकार बनाने वाली ममता बनर्जी को इस बार बीजेपी से जोरदार टक्कर मिल रही है. बीजेपी ने राज्य में टीएमसी के कई बड़े नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है जिसके बाद से टीएमसी के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं.

बीजेपी ने बंगाल में लगातार अपना प्रभुत्व बढ़ाया है. 2016 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो बीजेपी ने तब 294 सीटों पर चुनाव लड़कर महज 3 सीटें हासिल की थीं. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 42 में 18 पर अपना कब्जा जमा लिया. टीएमसी को 22 सीटें मिली थीं. 2014 में बीजेपी को बंगाल में महज दो सीटों से संतुष्ट होने पड़ा था. बीजेपी की जीत से ममता परेशान हो रही हैं. राजनीतिक प्रतिद्वंदिता का आलम यह है कि सूबे में राजनीतिक हत्याओं का एक सिलसिला चल निकला है. आए दिन किसी न किसी पार्टी के वर्कर की हत्या की खबरें सुर्खियों में रहती हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा पर पथराव की घटना भी सामने आ चुकी है.

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