क्या बिजली गुल! दाम बढ़ाने का झटका तो नहीं?

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

बड़ी जोरों से खबरें है कि देश में कोयले की भारी कमी होने वाली है. सिर्फ दो दिन का कोयला स्टाक में है. यानी बिजली गुल करने का एक बहाना है. या फिर जनता को और किसी परेशानी में धकेलने की साजिश है. दिल्ली में थर्मल पावर का उत्पादन ज्यादा है. यानी की कोयले को जला कर दादरी में एनटीपीसी बिजली का उत्पादन करती है, और यही बिजली दिल्ली के घरों को सप्लाई होती है. यदि कोयला खदानों में दबे रहने दिया जा रहा है और खुदाई से प्राप्त कोयला मात्र देश में दो दिन का बचा है, तो इसका दोष किसके सर पर मड़ा जा सकता है?
अंधेरे से बचाएं

ताजी जानकारियों के हिसाब से दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस कोयला संकट से उभरने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मादी को पत्र से अवगत कराया है कि शीघ्र कोयले की कमी को दुरस्त करने के लिए कोई कदम उठाएं, ताकि दिल्ली को अंधेरे से बचाया जा सके.

बिजली संकट से सबसे बड़ी मुश्किल इस बात में है कि कोरोना की वैक्सीन को सुरक्षित रखने के लिए पावर की जरूरत पड़ती है. पावर कट करने से फ्रीजर प्रभावित होंगे, जिसमें ए दवाएं सुरक्षित रखी जाती हैं.
बिजली जरूरी है

इतना ही नहीं आज बड़े नगरों में बिजली की सप्लाई जरूरी है. हर वस्तु को सुरक्षित रखने के लिए रेफ्रिजिरेटर जरूरी हो गए हैं. देश में हर चेन यानी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने के लिए बिजली आज महत्वपूर्ण है. इसमें चाहे दूध हो, कोल्ड स्टोर हों जहां करोड़ों का सामान बिजली के द्वारा सुरक्षित रखा जाता है. वह सब बिजली बिना सड़ जाने के अलावा कुछ नहीं होगा. आज हर गतिविधि बिजली के बगैर नहीं हो सकती है. आपके कंप्यूटर, समाचारों का आदान-प्रदान करने से लेकर उसके प्रोडक्सन तक बिजली ही महत्त्वपूर्ण साधन है. इस साधन को लगातार बनाए रखना जरूरी है. यह मात्र एक घर की बिजली गुल होने का डर नहीं है. यह फिलहाल दिल्ली में जो बिजली की व्यवस्था में सुधार हो रहा था, उसको झटका लगेगा. दिल्ली देश की राजधानी है, उसे अंधेरे में नहीं रखा जा सकता है. सारे कामकाजों को निरतंर चलने देने के लिए बिजली ही है. जैसे बताया गया है कि दादरी का एनटीपीसी प्लांट दिल्ली की बिजली की आपूर्ति करता है, उसके लिए कोयला जरूरी है.

कोयले का खनन क्यों नहीं हुआ?

यह तो दिल्ली एक छोटे राज्य की बात है, जो पूरी तरह से केंद्र पर आश्रित है, उसका खयाल रखना केंद्र की जिम्मेदारी है. इस आपातकालीन स्थिति को सुधारने के लिए शीघ्र व्यवस्था करनी जरूरी है. अब प्रश्न उठता है कि कोयले का उत्पादन क्यों नहीं सुचारू रहा, जब यह सरकार को पता है कि अर्थ व्यवस्था को चलाने के लिए ‘शक्ति’ फिलहाल कोयले के बिना हम नहीं रह सकते हैं. अन्य साधन उतने पर्याप्त नहीं हैं- जैसे गैस प्लांट, जो सप्लाई जारी रख सके, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हाइडो ऊर्जा का भी दोहन उस अनुपात में नहीं है, जो देश की खपत को कोयले के बिना पूरी कर सके.

केंद्र राज्यों में तालमेल हो

इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि इस संकट को सुलझाने में कोई कोताही केंद्र सरकार न करे, जैसे पिछले दिनो हाय तौबा कोरोना काल में ऑक्सीजन के अभाव में हुआ था. इसमें राज्यों और केंद्र सरकार को आपसी तालमेल के साथ इस संकट से निकलना होगा. यदि वैकल्पिक ऊर्जा पर्याप्त होती, तो तब सबकुछ सामान्य रहता, पर जहां कोयले पर हम आश्रित हैं, जिसके पर्याप्त भंडार तो हमारे पास जमीन के अंदर हैं, पर उसका दोहन नहीं किया जा रहा है. विदेशों पर हमें आश्रित नहीं रहना चाहिए. अपने देश को स्वावलंबन पर खड़ा करना चाहिए. इसमें जनता की कीमत पर केंद्र और राज्यों के बीच गंदी राजनीति नहीं होनी चाहिए.

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