काश! नैतिक आधार पर गृह राज्य मंत्री इस्तीफा देते?

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

क्या हम ब्रिटिश राज में हैं? या उससे निकलकर 75 वर्ष के आजाद देश भारत में हैं. संदेह ही नहीं, जिस तरह से सत्ता सुख के लिए कानूनों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, वह यह सोचने को बाध्य करता है कि ऐसे में स्वस्थ लोक तंत्र की बात करना बेईमानी हो गई है. सभी जानते हैं कि पिछले दस महीनों से कृषि कानूनों के खिलाफ जो आंदोलन सुलग रहा है, उसकी आग किस-किस को शांत करेगी?

लखीमपुर खीरी अहिंसक आंदोलन पर धब्बा!

हाल की ताजा घटना लखीमपुर खीरी की है. वहां किसान अपना आंदोलन शांतिपूर्ण ढ़ंग से चला रहे थे, एकदम अहिंसक ढ़ंग से गांधीजी की तर्ज पर, जो कुछ वहां हुआ, वह गांधी के सपनों के भारत के विपरीत था. भारत के गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के वीडियो फुटेज देखने से पता चलता है कि एन-केन प्रकारेण किसानों को भड़काने का प्रयास किया गया, उन्हें धमकियां दी गईं, इसके बावजूद, वे अहिंसक आंदोलन चला रहे थे, केंद्र सरकार से उनका एक सविनय आंदोलन था. वे चाहते थे कि किसानों की परिस्थितियों के हिसाब से कृषि कानून बनें और उसका लाभ देश की जनता को मिले, पर इसकी बजाय, गृहमंत्री की गाड़ी ने लखीमपुर खीरी में चार किसानों सहित एक पत्रकार को मौत के घाट उतार दिया, उनके ऊपर गाड़ी चढाई, यह सोचने का विषय है कि जहां इस आजाद भारत में-जहां संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है, वहीं उनको गाड़ी के नीचे रौंदा गया है. ऐसा काम एकदम संविधान के अलावा, मानव अधिकारों को कूड़े के ढ़ेर में फेकने जैसा है.

गृह राज्य मंत्री को पद से हटना चाहिए

यदि गृहमंत्री संशय के घेरे में हैं-जैसा कि मामला चल रहा है, न्यायालय के पास, वहां हुई मौतों के जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई चल रही है. इसमें गृहमंत्री की गाड़ी और उनके बेटे पर आरोप लगा है, तब ऐसी स्थिति में स्वयं गृहमंत्री को पद से हट जाना चाहिए था, यह एक नैतिकता का तकाजा है. यदि आप लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो प्रधानमंत्री के बगैर आदेश के ही इस्तीफा दे देना चाहिए था. न्यायालय के निर्णय के बाद यदि तथाकथित अपराधी निर्दोष निकलते, तब वे पुनः अपना पद संभालते, नहीं तो ऐसी अवस्था में मंत्रालय के दुरुपयोग की गुंजाइश शत-प्रतिशत है.

देश में ऐसे अनुकरणीय उदाहरण हैं. एक बार जब लालबहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे, तब एक रेल दुघर्टना हुई, थी, तो शास्त्रीजी ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए अपने को दोषी मानते हुए इस्तीफा दे दिया था. क्या ऐसा आज के राज काज में संभव नहीं है. अपनी नैतिक जिम्मेदारी का परिचय गृहमंत्री को देना चाहिए था. इस बात को लेकर विपक्षी कांग्रेस भी राष्ट्रपति के पास अपनी संवेदनाओं को लेकर गई और देश के संविधान रक्षक से गुहार लगाई कि निरीह किसानों की हत्या पर निस्पक्ष जांच हो, यह जांच पदासीन न्यायाधीश से ही करवाई जाए.

निहंगों ने आत्मसर्मपण किया

किसान आंदोलन में एक और घटना सामने आई, सिंधु बार्डर पर कुछ निहंगों ने एक मजदूर की हत्या कर दी, इस पर आरोप था कि उसने गुरुग्रंथ साहब का अपमान किया. इस हत्या ने अहिंसक किसान आंदोलन को रक्तरंजित करने की कोशिश की, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, पर जिन लोगों ने हत्या की, वे स्वयं ही सरंडर हुए और पुलिस के सम्मुख अपना हत्या का जुर्म कबूल किया.

गुड गवर्नेंस कहां?

देखिए यह दोनो ही घटनाएं किसान अंदोलन के बीच हुई, पर इसमें एक अपराधी पक्ष ने स्वयं ही अपना जुर्म कबूल किया, वहीं दूसरा पक्ष लखीमपुर खीरी का है, जहां देश का गृह राज्य मंत्री सीधे-सीधे लखीमपुर खीरी कांड से जुड़ा है, जो कानून का रखवाला है, वह नैतिकता के आधार पर पदच्युत नहीं होना चाहता है. यह न्याय करने की राह में बहुत बड़ा रोड़ा है. न्याय पाने की आशा को देखते हुए संवैधानिक ढ़ंग से गुड गवर्नेंस का उदाहरण मंत्री को देना चाहिए.

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