न्याय की आस कैसे पूरी होः ना जज और ना अर्जेंसी!

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

देश में न्याय की आस लिए बैठे लोग मृत शैय्या तक पहुंच गए हैं, पर इसकी चिंता ना तो सरकार को है और ना न्यायालयों को. वकील तो चाहते हैं केस लंबा चले और उनकी कमाई पर कोई आंच ना आए. इसलिए हर तरह की सांठ-गांठ न्यायालयों में डेट लेने के लिए लगी रहती है. बेचारा गरीब रह-रहकर यही सोचता रहता है कि चलो इस डेट में फैसला नहीं हुआ है, आगे की तारीख में तो फैसला जज साहब सुना ही देंगे. बेचारे न्याय की आस लगाए व्यक्ति को क्या पता कि अगली तारीख भी वकील ले लेगा और फैसला आने का रास्ता पीछे खिसक जाएगा. इन तारीखों के जाल में कहीं पक्ष-विपक्ष के भ्रष्ट वकील जजों को ऐसे समझाएंगे कि अगली डेट पर हम दोनों पार्टियां मिल कर जिरह कर फैसले के लिए तैयार हो जाएंगे, पर ऐसा होता नहीं, केस वर्षों पीछे खिसक जाता है और ज्यादा मामलों में बेचारा न्याय का भूखा गरीब स्वर्ग सिधार जाता है. यही है हमारे देश में न्याय की मिसाल!


कैसे होगा न्याय, पेंडिंग केसों की भरमार!

पिछले वर्ष के आंकड़ों के हिसाब से पेंडिंग केसों की संख्या अदालतों में सवा तीन करोड़ से अधिक है. कहीं उच्चतम न्यायालय में जज नहीं है, तो कहीं निचली अदालतों में वर्षों से न्यायाधीश नहीं हैं. देखिए एक नजारा-
निचली अदालतों में जजों की हजारों पद रिक्त.

केसों की पेंडिंग तीन करोड़ से ज्यादा.

सरकार और हाई कोर्ट में एक राय नहीं.

1958 में लॉ कमीशन, यानी विधि आयोग ने आल इंडिया जूडिशियल सर्विस के लिए सिफारिश की थी, जो अभी तक किसी भी सरकार ने नहीं लागू की. मोदी सरकार को भी सात वर्ष पूरे हो चुके हैं, पर वह भी न्याय दिलाने के मामले में ढ़ीली हो रखी है. बहाना है कि सरकार तैयार है, पर कोर्ट तैयार नहीं हैं, यह कैसे हो सकता है. जब न्याय मंत्रालय सरकार का इंजन है, वह क्यों सुस्त है?

14 वें ला कमीशन ने 1958 में आल इिंडिया जूडिशियल सर्विस की सिफारिश की थी. इसके बाद संविधान के अनुच्छेद-312 व 42 वें संशोधन के तहत इसका प्रावधान किया गया था. इसके बाद भी 77 वें और 116 वें लॉ कमीशन ने भी ऐसी ही सिफारिश की थी.


देशभर में निचली अदालों में लंबित केस

निचली अदालतों में 3 करोड़ 24 लाख केस लंबित हैं. इसमें जजों के सैंक्सन पद 24064 हैं, जिसमें मौजूद कार्यरत जज सिर्फ 19160 हैं.

देश के सभी 25 हाई कोर्टों में पेंडिंग केस 45 लाख हैं. इसमें जजों के सैंक्शन पद 1079 हैं, जिसमें मौजूदा समय में सिर्फ 694 पद भरे हैं और 385 पद रिक्त हैं.

सुप्रीम कोर्ट में कुल सैंक्शन पद 35 हैं, पर सभी पद भरे होने के बावजूद केस पेंडिंग में हैं.


कालेजियम की दशा

जजों को नियुक्त करने के लिए कॉलेजियम बना हुआ है, कॉलेजियम का काम है कि सरकार को जजों की नियुक्त करने की सिफारिश करना, कॅालजियम में सुप्रीम कोर्ट के जज होते हैं, जिनकी नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश करता है, इसमें स्वयं मुख्य न्यायाधीश भी शामिल है. कॉलेजियम ने अपनी सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी है, पर केंद्र सरकार न्यायाधीशों द्वारा भेजी सिफारिशों को मानने से इनकार कर रही है. लेकिन इसमें यह प्राविधान भी है कि यदि कॉलेजियम दोबारा अपनी सिफारिशों को वेसे ही भेजता है, तो सरकार बाध्य है कि जजों की नियुक्ति कॉलेजियम के हिसाब से करे. पर देखने में आ रहा है कि वर्तमान केंद्र सरकार कॉलेजियम की शिफारिशों को सीधे ढ़ंग से मानने को राजी नहीं है, इस कारण बहुत सारे पद रिक्त हैं.


कॉलेजियम और सरकार में खींचतान!

ज्ञात हुआ है कि औसत 50 प्रतिशत हाईकोर्ट की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने नहीं माना, उसके पीछे उनकी जांच-पड़ताल में कमियां थीं. इस तरह से जनता के साथ यह खिलवाड़ है, न्याय के देवताओं से उम्मीद करते हैं कि अधिक से अधिक पेंडिंग केसों को निपटाएं. कहीं-कहीं तो पीढ़ियां की पीढ़ी न्याय पाने की इंतजार में खत्म हो गई हैं . क्या फायदा उस न्याय का? जिसका निपटारा पीड़ित के जीवित रहते, समय पर नहीं हो पाए.

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