देश में लिखने-बोलने की कितनी स्वतंत्रता?

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

कल दो पत्रकारों को खुलकर सरकार के खिलाफ गलत कामों को ना करने की आवाज उठाने पर, नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया. ये दो पत्रकार हैं-मारिया रेसा और दिमित्रि अ मुरातोव. मारिया रेसा ने फिलीपीन के राष्ट्रपति की जन विरोधी नीतियों-नशा और भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर आवाज उठाई, वे कहती हैं कि आज के समय में पत्रकारों के लिए ऐसी सरकारों के खिलाफ लिखना बड़ा कठिन हो गया है.

इससे पूर्व टाइम पत्रिका ने 2018 में इन्हें वर्ष का व्यक्ति घोषित किया था. दूसरे नोबेल पुरस्कार विजेता रूस के दिमित्रि अ मुरातोव हैं, इन्होंने रूस में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए जम कर आवाज उठाई है. 1993 में मुरातोव ने स्वतंत्र अखबार ‘नोविया गजेटा’ की स्थापना की. इस अखबार में काम करने वाले 6 पत्रकारों को मार दिया गया था, फिर भी इस अखबार की कलम को सरकार नहीं मार सकी. अखबार ने चेचन्या में हो रहे जनसंहार पर खूब लिखा.

पुरस्कृत करने वाली नोबेल कमेटी ने पुरस्कार की घोषणा करते समय दुनिया के उन पत्रकारों को संबोधित किया, जो सरकारों की दमन नीतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं. कमेटी का कहना था कि यह पुरस्कार उन सभी लोगों के नाम का है, जो नीति सम्मत, नीतियों का पोषण अपनी कलम और डिजिटल ढंग से कर रहे हैं.


भारत में कलम की आजादी कितनी स्वतंत्र है?

हमें नहीं लगता है कि आज देश में कलम स्वतंत्र हो कर समाचारों का संप्रेषण कर रही है. समाचार ही नहीं पूरा भारत का मीडिया आज के संदर्भ में एकदम पंगु अवस्था में है. इससे पूर्व 1975 में घोषित आपातकाल के दौरान अखबारों पर सेंसरशिप थी. अखबार सरकार की नीतियों के खिलाफ कुछ भी नहीं लिख सकते थे. इसके विरोध में समाचार पत्रों ने आपातकाल की घोषणा के समय अपने संपादकीय कोरे छोड़े थे. यह समय ज्यादा नहीं चला, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी गलती का आभास हो गया था, वह इस अवस्था को ज्यादा समय तक नहीं चला सकी. श्रीमती गांधी का अभिव्यक्ति के खिलाफ जाने से 1977 में जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दंड दिया. आगे सत्ता पाने पर वह संभलकर चलीं और अखबारों के स्वतंत्र विचारों और समाचारों को छापने से नहीं रोक पाईं.


अखबारों की स्वतंत्रता पर बिहार प्रेस बिल

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी बिहार प्रेस बिल के नाम से मीडिया की स्वतंत्रता को कम करने की कोशिश की थी, कानून पास किया था, लेकिन उन्हें पत्रकारों के भयंकर विरोध के कारण बिहार प्रेस बिल को वापस लेना पड़ा था, लेकिन आज वर्तमान केंद्र सरकार अच्छी तरह से मीडिया को अपने पक्ष में करने में कामयाब हो गई है. सरकार की गलत नीतियों का पत्रकार विरोध नहीं कर सकते. क्योंकि मालिकों पर नकेल डाल दी गई है, यदि वे सरकार के खिलाफ कुछ लिखते हैं, तो उन्हें कहीं ठंडे बस्ते में डाले जाने का डर है. हमारा मानना है कि यह कार्य सरकार के विरोध में जा सकता है, आज मीडिया सरकार के आंख-कान हैं. यदि आंख-कान की शक्ति को कम करने की कोशिश होगी, तो देश में हो रही अशांति का जायजा लेने में भी सरकार असमर्थ हो सकती है. ‘यस मैन’ से वास्तविकता से दूर हो रही सरकार को सोचकर मीडिया की स्वतंत्रता को अक्षुण रखने की कोशिश करनी चाहिए. तभी अपने कार्यें की वे समीक्षा कर सकते हैं.

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