उत्तर प्रदेश में चुनाव की सुगबुगाहट

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

उत्तर प्रदेश में अब पश्चिम बंगाल के बाद चुनाव की गरमाहट देखी जाने लगी है. खेल रोचक होने की उम्मीद है. पिछले दो चुनावों में प्रदेश में, जो पार्टी सत्ता में आईं, वह स्वयं में पूर्ण बहुमत के साथ आई थीं. योगी सरकार से पहले समाजवादी पार्टी की सरकार का नेतृत्व अखिलेश यादव ने किया था, उस वक्त युवा और स्वच्छ छवि होने का फायदा अखिलेश को चुनाव में मिला था, पर दूसरी पारी के आते-आते अखिलेश को सहारे की जरूरत पड़ी थी, तो उसके लिए कांग्रेस पार्टी का सहारा राहुल गांधी ने दिया था, पर न राहुल गांधी का सहारा काम आया और ना ही अखिलेश सरकार बना पाए. बाजी भाजपा ने मारी.

चुनावी उठापटक का दौर

चुनाव में भाजपा ने पहले कोई चुनावी चेहरा नहीं, नहीं खड़ा किया था, लेकिन संघर्ष दमदार था. टक्कर में एक और पार्टी भी मैदान में थी-वह थी बहुजन समाजवादी पार्टी, इसका नेतृत्व पार्टी के शुरुआत से अब तक मायावती के हाथों में है. एक समय समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी मिलकर लड़ी थी. तब दोनों ने संयुक्त प्रयास से चुनाव जीता था. फिर दोनों पार्टियों के बीच, आधा-आधा टर्म का मुख्यमंत्री बनने का फैसला हुआ, उसमें इनका समीकरण ज्यादा सफल नहीं हुआ. मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग की चाल चली, यह इंजीनियरिगं कामयाब हुई थी और मायावती पूरे कार्यकाल तक मुख्यमंत्री बनी रही. इस सोशल इंजीनियरिंग में बहुजन समाजवादी पार्टी ने ऐसा समीकरण बिठाया, जिसमें हर जाति के लोगों के लिए सीटें रखीं, पहले जिस दलित पार्टी के नाम से और वर्ग दूर भागते थे, अब वह स्थिति नहीं रही थी. पार्टी में दलित तो थे ही, साथ ही ब्राह्मण, मुसलमान और अन्य वर्गों को भी सम्मान दिया गया था.

अब चुनाव का गणित

अब जो 2022 का चुनाव सामने है. हर पार्टी-जैसे भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी और बहुजन समाजवादी पार्टी चुनाव के लिए आमने-सामने खड़े हैं. यह तो तय है कि भाजपा अपने दमखम पर चुनावी अखाड़े में है, उसे फिलहाल किसी सहायक दल को अपने साथ करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है. स्वयं योगी आदित्य नाथ अपने बल पर चुनाव की रणभेरी बजाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बार कुछ दिनों पहले लगा था कि अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में योगी जो को पद मुक्त करने का अभियान कामियाब होगा, पर योगी के सख्त विरोध के कारण भाजपा योगी को हटाने में कामयाब नहीं हो सकी, उल्टे प्रधानमंत्री मोदी ने, योगी आदित्यनाथ की जमकर खुले मंचों से तारीफ की. जिस वक्त योगी की मुख्यमंत्री की ताजपोशी हुई थी, उस माहौल में कहना कठिन था कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा, उन्हें संसद की सीट से हटाकर उत्तर प्रदेश में अचानक ही भेजा गया था. किसी को कानों कान खबर नहीं थी कि योगी उत्तर प्रदेश का दायित्व संभालेंगे. लेकिन अब लगता है कि वे आनेवाले चुनाव में दुबारा सत्ता में आने का प्रयास करेंगे. वेसा यह कहना मुश्किल है कि वे उत्तर प्रदेश में कुर्सी पर कब तक रहेंगे. जैसा ट्रेंड भाजपा आजकल अपना रही है, वैसा फेरबदल वह उत्तर प्रदेश में कर सकती है.

कांग्रेस का युवा चेहरा

कांग्रेस पार्टी जो पिछले कई चुनावों में उत्तर प्रदेश में हाशिए पर है, वहां एक युवा और महिला चेहरा दिख रहा है, वह चेहरा है प्रियंका गांधी. प्रियंका गांधी ने बीच-बीच में सत्तारूढ़ पार्टी को बहुत बार चुनौतियां दी हैं. अभी ताजी चुनौती लखीमपुर खीरी की है. भाजपा चुपचाप प्रियंका को जाने देती, तो पता ही नहीं चलता कि क्या हुआ. पर इस खेल को स्वयं प्रदेश सरकार ने अपने लिए भारी कर दिया है. जो लीड किसानों और देश की जनता के सामने अपने नेतृत्व की प्रियंका ने छोड़ी है, उससे आने वाले समय में एक मजबूत कंग्रेस पार्टी का चेहरा जनता के बीच आ गया है. जनता को चुनाव का एक और विकल्प मिल गया है.

यदि इसी तरह से प्रियंका गांधी लीड लेती रही, तो उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनाव में कांग्रेस भले ही सत्ता में ना आए, लेकिन अपना राजनीतिक दखल मजबूत कर सकती है.

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