क्या पत्रकार संसद की कार्रवाई की रिपोर्टिंग नहीं कर सकते? सड़क से संसद तक पत्रकारों को मार्च करना पड़ा!

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

2 दिसंबर को प्रेस क्लब से संसद तक पत्रकारों को मार्च करना पड़ा. यह मजबूरी देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए एक पहल थी. क्या वजह है कि लोक सभा और राज्य सभा की रिपोर्टिंग पत्रकार नहीं कर सकते. अब तक तो देश का हर राष्ट्रीय मीडिया संसद में हो रही कार्रवाई को जनता तक पहुंचाने के लिए संसद में जाकर प्रत्यक्ष रिपोर्टिंग करते थे, उसके लिए व्यवस्था थी कि लोक सभा के स्पीकर और राज्य सभा के चेयरमैन पत्रकारों को हाऊस में बैठने की अनुमति देते थे. इसके लिए देश के हर मीडिया संस्थान के लिए संसद में आने के लिए पास दिए जाते रहे हैं. वह स्थाई और अस्थाई होते थे. संसद के सत्र में कुछ पास तबतक के लिए होते थे, जब तक संसद का अधिवेशन चल रहा होता था और कुछ पास ऐसे होते थे, जो लंबे समय तक संसद की गैलरी में आने के लिए पत्रकारों को बांटे जाते थे. लेकिन अबकी बार इस प्रथा को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया. लगता है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपने कार्य करने के लिए बाधित किया गया है. देश इस वजह को जानना चाहता है. जिस प्रेस ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अपना श्रेष्ठ योगदान दिया, उसी प्रेस की अहमियत को वे लोग नजरअंदाज कर रहे हैं, जिन्होंने कभी आजादी के संघर्ष को नहीं समझा और प्रेस की भूमिका को भी नहीं समझा. इस चौथे स्तंभ को नकारने से स्वयं ही वह लोग खतरे में पड़ेंगे, जिन्हें डर है कि उनकी भूमिका संदेहास्पद है. प्रेस से इन्हें भयभीत होने की जरूरत नहीं, कुर्सी से उसे प्रेस तो निकाल नहीं सकती, पर हां, यदि प्रेस के प्रति ऐसे प्रतिबंध लगे, तो देश की जनता उन शासकों की गतिविधि को जरूर संदेहास्पद ढ़ंग से देखेगी.

लोक सभा और राज्य सभा के स्पीकर को पैगामः

2 दिसंबर को प्रेस से संबंधित सभी संगठनों ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के नेतृत्व में संसद तक मार्च किया, इसमें दि एडटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, दि प्रेस एसोशिएसन, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्टस, दि इंडियन वूमनस प्रेस कॉर्पस, दि केरला यूनियन ऑफ वर्ककिंग जर्नलिस्टस, वर्ककिंग न्यूज कैमरामैंस एसोशिएसन और केरला प्रेस क्लब शामिल थे. यह स्थिति किसी भी तरह से प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने का कार्य है. यह नहीं होना चाहिए.

यदि प्रेस पर अंकुश लगा तो सरकार के लिए खतरा ही होगा!

जैसा कि लोक तंत्र में प्रेस की अहंम भूमिका होती है. यह सरकार के नाक कान होते हैं. भारत जैसे विशाल देश की अर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों की तस्वीर प्रेस ही देता है. माना कि सरकार के पास अपनी एंजेसियां हैं, वह सोचती है कि हमें किसी पत्रकार की रिपोर्ट की जरूरत नहीं है, हमारा सरकारी तंत्र स्वयं यह काम कर लेगा, पर यह सरकार को मुगालता है. सरकार को विकास का सही आईना प्रेस ही दिखाता है. सरकारी ऐजेंसियां अपनी नौकरी और अन्य कारणों से सही तस्वीर सरकार के कार्यों की नहीं दिखा सकती है. इस कारण सरकार अपनी गलतियों पर भी नजर नहीं रख सकती, इससे आगे आने वाले चुनाव में सही जानकारी के अभाव में चुनाव हारने में प्रेस के मुंह को बंद करना एक कारण बन सकता है. हमारी सलाह है कि चौथे स्तंभ को स्वतंत्र ढ़ंग से काम करने से न रोकें, नहीं तो खामियाजा आगे के चुनाव में भुगतना पड़ सकता है.

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