राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से अलवर और भरतपुर बाहर!

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

पता चला कि प्लानिंग बोर्ड राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ने, अपनी नई नीति से अल्वर और भरतपुर जिलों को दिल्ली में न मिलाने का फैसला किया है.

2041 के क्षेत्रीय योजना को स्वीकारते हुए बोर्ड ने फैसला लिया है कि राजस्थान राज्य के इन जिलों को राजस्थान में ही रहने दिया जाए. इससे पूर्व 1991 में, 69वें संविधान संशोधन के एक्ट से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को बनाया गया था. उस एक्ट के अनुसार अल्वर जिले को दिल्ली राजधानी में मिलाया गया था, फिर बाद में 2013 में भरतपुर जिले को भी सम्मिलित किया गया था. लेकिन कुछ स्रोतों से ज्ञात हुआ कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में मिलाने के बावजूद भी इन जिलों का विकास, उस तरह से नहीं हुआ, जैसा दिल्ली का होना चाहिए था. इस स्थिति से राजस्थान में असंतोष का माहौल था, इस बात को जानते हुए बोर्ड ने नई योजना में इन जिलों का विकास राजस्थान राज्य के हाथों रखने का निर्णय लिय है.


दिल्ली की नई सीमा

क्षेत्र का भौगोलिक आकार राजघाट दिल्ली से 100 किमी. तक के दायरे को गोलाकार रूप में विकसित करने की योजना है.
100 किमी. की सीमा के बाहर के क्षेत्रों और मौजूदा एनसीआर सीमा तक, सभी अधिसूचित शहरों, कस्बों के साथ-साथ एक्सप्रेस वे, राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य राजमार्गों, क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट सिस्टम को जोड़ने के लिए दोनों ओर एक किमी. का कॉरिडोर भी शामिल होगा.

वर्तमान में एनसीआर में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के 24 जिलों के साथ पूरा दिल्ली क्षेत्र शामिल है, जो 55,083 वर्ग किलो मीटर. के क्षेत्र का है.


क्षेत्रीय योजना का मसौदा

माना जा रहा है कि इस योजना से दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी मुक्त राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का निर्माण होगा. इससे क्षेत्र के लिए एक एयर एंबुलेंस सुविधा और हेलिटैक्सी, सड़क, रेल और अंतर्देशीय जलमार्ग के माध्यम से उच्च गति की कनेक्टिविटी का मार्ग मिलेगा.


बेहतर रेल सेवा

इस योजना में एनसीआर की निकटतम सीमा से दिल्ली तक 30 मिनट का मास ट्रांजिट रेल सिस्टम होगा.


वर्तमान में दिल्ली की स्थिति

वर्तमान में एनसीआर का क्षेत्र लगभग 150-175 किलोमीटर का है. यह दिल्ली-एनसीआर के कई दूरदराज के गांवों को भी मिलाता है, लेकिन 2041 की क्षेत्रीय योजना के अनुसार इस क्षेत्र को घटाकर 100 किलोमीटर के भीतर कर दिया गया है. अभी क्षेत्र में पानी, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.


दिल्ली गलियों में तबदील हो सकती है!

बोर्ड ने दिल्ली को छोटा करने का निर्णय तो जरूर ले लिया है, पर हमें संदेह है कि यह योजना कारगर हो पाएगी. इसका कारण है- विभिन्न राज्यों से आबादी दिल्ली की ओर आज से नहीं, तब से आ रही है, जब से देश स्वतंत्र हुआ है. यह सिलसिला रोक पाना किसी भी सरकारी एजेंसी के बस की बात नहीं है, हां, यदि सारी सरकारी एजेंसियां, जब तक एक्टिव नहीं होंगी, तब तक यही सिलसिला चलता रहेगा. वैसे भी एनसीआर का दायरा घटाने की बजाय उसके क्षेत्र को और विस्तारित करने की जरूरत पड़ेगी. इस बात को योजनाकारों को समझना चाहिए, नहीं तो दिल्ली और छोटी-छोटी गलियों में बदल जाएगी.

इसके उदाहरण आपके पास हैं. जिस तेजी से दिल्ली में ही नियोजित डीडीए के घरों को आज आप देखेंगे, तो उन्हें आप 20-25 वर्ष पहले देखते, तो वे खुले-खुले थे. आज वे ही घर अनऑथराइज्ड निर्माण से बंद घरों में तब्दील हो रखे हैं. इन घरों को ऐसा बनाने में पुलिस विभाग का भी हाथ है, क्योंकि अवैध निर्माण को करवाने में नगर निगम के साथ-साथ पुलिस के कर्मचारियों ने खूब धन अर्जित किया है. भ्रष्टाचार हर जगह चरम पर है. आज भी वह रुका नहीं, उसके बावजूद आप दिल्ली को स्मार्ट बनाने के लिए उसका दायरा संकुचित कर रहे हैं, तो वह किसी भी मायने में सफल होने में संदेह पैदा करता है.

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