अकाल के बाद देश अन्न में आत्मनिर्भर, पर दालों में अभी और कुछ करने की जरूरत!

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

आज देश में अतिरिक्त गेंहू-चावल हैं, पर दालें अभी बाहर से आयात करनी पड़ रही हैं. देश आजादी मिलने से चार साल पहले 1943 में अकाल से बुरी तरह ग्रसित था, लाखों लोगों की भूख से मृत्यु हुई थी. आजादी मिलते वक्त भारत दो देशों में विभाजित हो गया था. नए भारत को 82 प्रतिशत जनसंख्या मिली, लेकिन अन्न उत्पादन अविभाजित भारत में 75 प्रतिशत ही था. ऐसी स्थिति में अन्न की सुरक्षा देश में बहुत जरूरी थी. इस समस्या के निराकरण के लिए 1947 में खाद्य आयोग नीति का गठन किया गया था. इसकी सिफारिसें आने के बाद 1960 में हरित क्रांति को देश ने अपनाया.

इस क्रांति के माध्यम से खेती के लिए वैज्ञानिक सोच जागृत की गई. जिसमें अच्छी पैदावार देने वाली नस्लों को विकसित किया गया, इस कार्य में कृषि वैज्ञानिकों का बहुत बड़ा सहयोग रहा, नई तकनीकी को अपनाने में किसानों को समझाने में वैज्ञानिक सफल हुए, नहीं तो खेत तो वही थे मगर उत्पादन बहुत कमजोर था. कहीं वर्षा के अभाव में फसल पैदा नहीं होती थी, तो कहीं बीज तंदुरस्त नहीं मिलते थे. जिसके कारण किसान मेहनत तो करता था, पर उस मेहनत की वापसी नहीं हो पाती थी.

इस सब लिए कृषि के क्षेत्र में नई-नई तकनीकी को अपनाया गया. मिट्टी की उर्वरता को जांचने के लिए प्रयोगशालाएं खोली गईं. ऐसी फसलें बोई गईं, जो मिट्टी के अनुकूल हों. मिट्टी संरक्षण विभाग खोले गए, जिनका काम उपजाउ मिट्टी को संरक्षित करने का था. यह सब हमारे किसानों की मेहनत और कृषि वैज्ञानिकों की उपलब्धियां का प्रतिफल है. इन सब उत्पादों का मूल्य निर्धारण का काम भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के हवाले किया गया. देखिए भारत में खाद्य उत्पाद में देश ने कैसे सीढ़ियां चढ़ीं:

आयात पर 30 वर्षों तक निभर रहे

भारत 1951 में 40 लाख टन का विदेशों से खाद्यन्न मंगाता था, हरित क्रंति के पैर जमने के बाद भी मंगाने का सिलसिला 1980 तक चला. 1951 में 41 लाख टन,1961 में 35लाख टन, 1971 में 20 लाख टन और 1981 में मंगाने का सिलसिला 5 लाख टन तक रह गया था. इस प्रकार देश खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर हो चुका था.

दालों को मंगानें की अभी भी जरूरत

आज देश में आबादी तो बढ़ी, पर दालों के उत्पादन में हम अभी आत्मनिर्भर नहीं हो पाए या हमने दालों के उत्पादन में अपना ध्यान नहीं दिया, उसी के कारण विदेशों से दालों का आयात अभी भी हमें करने की जरूरत है, जब तक किसानों को दाल पैदा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता, तब तक हमारी निर्भरता विदेशी दालों पर ही रहेगी, उसका कारण है कि देश में प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत दालें ही हैं और हम हर दिन दालों के द्वारा ही अपनी प्रोटीन की मांग को पूरा करते हैं.

पिछले वर्षों में आयात में कमी हुई, जिसके कारण अभाव की स्थिति में दालों के भाव आसमान चढ़ गए. ऐसी अवस्था में सरकार को सोच समझकर ही दाल आयात को निरंतर बनाए रखना होगा, जब तक देश के भीतर वैकल्पकि दालों का उत्पादन करने की स्थिति बने.

पिछले पांच वर्षों में आयात

2016 में हमने विदेशों से 5951 हजार टन दाल मंगाई, 2017 में 6811 हजार टन, 2018 में 221हजार टन, 2019 में 2928 हजार टन और 2020में 2556 हजार टन दालों का आयात किया. इस तरह से देश में दालों की खपत को देखते हुए मंगाने की व्यवस्था ढ़ीली रही.

आज जब हम खाद्यान्न में निर्यातक देशों में आ गए, तब दालों में हमें किसी तरह भी पीछे नहीं रहना चाहिए. देश की समृद्धि के लिए संतुलित विकास जरूरी है. सही नीतियां बनाने की जरूरत है. तभी हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो पाएंगे. हमारी कोशिश इसमें आत्मनिर्भर ही नहीं होना है, उससे आगे दालों के निर्यातक देशों में भी गिने जाएं.

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