आंकड़ों में पिसता मध्यम वर्ग

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भगवती प्रसाद डोभाल (संपादकीय)

एक बार जब अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्जबुश भारत के दौरे पर थे, तब उन्होंने भारत के बारे में कहा था कि अमेरिका की जितनी जनसंख्या है, उतनी भारत मे मध्यम वर्ग की आबादी है. यानी दुनिया की निगाहें भारत के मध्यम वर्ग पर लगी हैं. उसका कारण है कि उनकी खरीदने की क्षमता निम्न आर्थिक वर्ग से अधिक है और वे विश्व बाजार में उद्योगों द्वारा उत्पादित उत्पाद का उपयोग करने वालों में हैं यानी दुनिया की हर प्रकार की मिलों की उत्पादित वस्तुओं का बाजार है, लेकिन वास्तव में देश में मध्यम वर्ग कितना है, वह आश्चर्य करने वाला है.


मध्यम वर्ग पर विश्व बाजार आश्रित

हर राजनीतिक दल और नेता, अधिकारी या उद्योगपति, बड़े फक्र से कहता है कि भारत में 26 करोड़ मध्यम वर्गीय लोगों की जनसंख्या है, लेकिन जर्मनी की एक संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में 2.36 करोड़ वयस्क ही ऐसे हैं, जो मध्यम वर्गीय फार्मूले में फिट बैठते हैं. वर्ष 2015 में दुनिया में 66.40 करोड़ वयस्क ही मध्यम वर्गीय थे. इसमें से 2.36 करोड़ भारत में रहते हैं. यह दुनिया की मात्र 3 फीसदी है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत में मध्यम वर्ग की पहचान के लिए कोई स्पष्ट पैमाना नहीं है. इसलिए विभिन्न संस्था अलग-अलग संख्या बताती रहती है. रिपोर्ट के मुताबिक उन व्यक्तियों को मध्यम वर्ग में गिना गया है, जिनकी एक वर्ष के दौरान 13,662 डालर यानी 7,37,748 रुपए की संपत्ति रही हो. इसे यदि मासिक आय के आधार पर बांटां जाए तो यह 61,480 रुपए बैठती है.


मैकिंजी का सर्वेक्षण

इसी तरह 2005 में मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 करोड़ लोग मध्यम वर्गीय हैं. इसमें नेशनल काउंसिल अप्लाइड इकॉनोमिक्स रिसर्च के आंकड़ों का इस्तेमाल किया था. इसके अनुसार साल में दो से दस लाख रुपये कमाने वाले व्यक्ति को इसमें शामिल किया गया था. उसी वर्ष विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 26.24 करोड़ मध्यम वर्गीय हैं. इनकी गणित में आमदनी की न्यूनतम सीमा दो डालर प्रति दिन और अधिकतम सीमा 13 डालर प्रतिदिन रखी गई थी.


संपत्ति को आधार को माना गया

क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट में आमदनी नहीं, बल्कि उनकी संपत्ति को मूल आधार माना गया था. इसने उन व्यक्तियों को इस सूची में शामिल किया था, जिनकी संपत्ति 13,662 डालर या 7,37,748 रुपए से अधिक थी. इसकी भी गणना हुई कि भारतीय लोगों की संपत्ति की वृद्धि की दर पूरी दुनिया में दूसरी सबसे अधिक रही है. इसमें चीन पहले स्थान पर था. भारत के 90 फीसदी से अधिक वयस्क जनसंख्या संपत्ति के हिसाब से निचली श्रेणी में आते हैं. इनकी संपत्ति 10,000 डालर से भी कम है. इसमें भारत में असमान संपत्ति के वितरण का भी उल्लेख किया गया है. जैसा कि बताया गया है कि भारत में मध्यम वर्ग की आबादी 4 करोड़ है, या यों कहें कि कुल आबादी का 3 प्रतिशत है.


जीवन स्तर में भौगोलिक विषमता!

देश में लोगों के जीवन स्तर में भिन्नता है. पता चला कि गरीबी घटकर 2.7 फीसदी हो गई. ऐसा माना जा रहा है कि अब भारत सबसे गरीब लोगों वाला देश नहीं है. यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में आय असमानता काफी है, क्योंकि भीषण गरीबी होने के साथ, यहां दुनिया के सबसे अमीर लोग भी रहते हैं. यदि औसत आंकड़ों पर भरोसा किया जाए, तो एक खरबपति की आय भी उसमें सम्मिलित होती है, जो कि आम भारतीय के लिए किसी भी रूप से फायदेमंद नहीं होती है. भारत में जीवन स्तर में बड़े पैमाने पर भौगोलिक विषमताएं हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में काफी दरिद्रता है, बजाए शहरी क्षेत्रों के.

यह सब विभिन्न आर्थिक वर्गों में बंटे भारत को देखा जाए तो वोट पाने के लिए राजनीतिक दल निम्न अर्थिक वर्ग को चुनावी घोषणा से खुश कर लेते हैं, पर मध्यम वर्ग इस सारी प्रक्रिया में पिसता चला जाता है, उसे किसी प्रकार की रियायतें सरकार से नहीं मिलती, जिसकी वह अपेक्षा कर रहा है. उसे सिर्फ एक औजार माना जा रहा है टैक्सों का कलक्शन करने के लिए. आयकर से लेकर बाजार में जो भी वस्तु बिकने के लिए उतर रही है, वह सारी अपरोक्ष टैक्सों से भरी पड़ी हैं. खाने-पीने, आवास और वस्त्रों पर खूब टैक्स का कलक्शन हो रहा है. उसकी आमदनी कहीं भी संचित नहीं हो पाती. जो वह कमा रहा है, वह आजीविका को चलानेभर का अर्जन है. इस दिशा में ठोस आर्थिक नीतियों को बनाने की जरूरत है, ताकि सारी असमानताओं का निराकरण हो सके.

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